Tuesday, August 9, 2011

पवित्र क़ुरआन का हिन्दी अनुवाद Hindi Anuwad Kuran

हिन्दी पाठकों में, विशेषकर हमारे हिन्दू भाईयों में क़ुरआन को जानने की प्रबल इच्छा पाई जाती है। कुछ वजहों से उनकी यह ख्वाहिश अब और भी शदीद हो गई है। सच्चाई के लिए उनकी तड़प और प्यास को देखते हुए हम आज पवित्र क़ुरआन का हिन्दी अनुवाद उन्हें सप्रेम भेंट कर रहे हैं।
यह रमज़ान का महीना है और रमज़ान क़ुरआन के नाज़िल होने का महीना भी है और इसे ज़्यादा से ज़्यादा पढ़े जाने का महीना भी है। इसे समझकर पढ़ा जाए और पढ़कर इस पर अमल किया जाए तो इंसान की समस्याएं हल हो जाती हैं और जीवन और मृत्यु के बारे में अपने हरेक सवाल का जवाब मिल जाता है।
जिन बातों का जानना ज़रूरी है उन बातों की सही और सच्ची जानकारी शुद्ध रूप में आज केवल क़ुरआन के ज़रिये ही मिल सकती है।
पेश है आपके लिए आपके सवालों का जवाब और आपकी समस्याओं का समाधान :
 पवित्र कुरआन  पढने  के लिए यहाँ क्लिक करें 










Saturday, July 16, 2011

दर्शनों की रचना से पूर्व मूल धर्म

दार्शनिकों ने बहुत से दर्शन रचे हैं किसी ने अद्वैत कहा है और किसी ने कुछ और कहा है। नास्तिकों ने तो ईश्वर के अस्तित्व का ही इन्कार कर दिया। जैसे नास्तिकों के कहने से ईश्वर का अस्तित्व शून्य नहीं हो जाता ऐसे ही किसी के लिख देने से सृष्टि ईश्वर नहीं हो सकती। ईश्वर और आत्मा अनदेखी हक़ीक़तें हैं। इनके बारे में भी सोचें और हरेक पहलू को सामने रखें और यह देखें कि दर्शनों की रचना से पूर्व भारतीय ऋषि ईश्वर का क्या स्वरूप बताया करते थे ?
मूल धर्म वही है।

Tuesday, January 18, 2011

ZEAL: सौतन जुल्फें !

ZEAL: सौतन जुल्फें !
आ ग़ैरियत के पर्दे इक बार फिर उठा दें
बिछड़ों को फिर मिला दें, नक्शे दूई मिटा दें
सूनी पड़ी है मुद्दत से दिल की बस्ती
आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें
दुनिया के तीरथों से ऊंचा हो अपना तीरथ
दामाने आसमां से इसका कलस मिला दें
हर सुब्ह उठके गाएं मन्तर वो मीठे मीठे
सारे पुजारियों को ‘मै‘ पीत की पिला दें
शक्ति भी शांति भी भक्तों के गीत में है
धरती के बासियों की मुक्ति प्रीत में है

http://vedquran.blogspot.com/2011/01/absolute-peace.html

Wednesday, October 13, 2010

The real mission of Christ ईसा मसीह का मिशन क्या था ? और उसे किसने आकर पूरा किया ? - Anwer Jamal

I love Christ , The messiah, messenger of God .
आपने क्रिएशन, हज़रत ईसा मसीह को क्रिएटर बना डाला। यह ग़लत है।    - Anwer Jamal
                                       
राकेश लाल जी ! आपका आना अच्छा लगा, लेकिन यह हिन्दी ब्लॉग है , अगर आप बाइबिल के वचनों को हिन्दी में दिखाते तो और भी अच्छा रहता। मैं बचपन से ही इंजील और मसीह में आस्था रखता हूं। नवीं क्लास में था तो मुझे ‘दिनाकरन जी‘ ने नया नियम भेजा, बाद में मुझे पूरी बाइबिल उर्दू में एक पादरी दोस्त ने दे दी, फिर अंग्रेज़ी में भी एक प्रति एक और पादरी मित्र ने गिफ़्ट कर दी।

यूहन्ना की पहली आयत आपने उद्धृत की है और वचन को परमेश्वर ही घोषित कर दिया है। यह एक ग़लत बात है। हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम की ज़बान इब्रानी या सुरयानी थी। उनके सामने किसी ने उनके वचनों को संकलित नहीं किया। वेटिकन सिटी में रखे हुए नुस्ख़े लैटिन और यूनानी भाषा में हैं, जो मसीह के साढ़े तीन सौ साल बाद के हैं। उनका भी केवल अनुवाद ही उपलब्ध कराया जाता है। इस आयत में यूनानी भाषा का शब्द ‘होथिओस‘ परमेश्वर के लिये आया है और जहां ‘एन्ड द वर्ड वॉज़ गॉड‘ आया है वहां यूनानी शब्द ‘टोन्थिओस‘ आया है जिसका अर्थ है ‘ देवशक्तियों से युक्त ‘। अर्थात वचन देवशक्तियों से युक्त था। आपने क्रिएशन को क्रिएटर बना डाला। यह ग़लत है।
हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम ने हमेशा खुद को खुदा के बन्दे के तौर पर पेश किया आप ग़लती से उन्हें खुदा का दर्जा दे बैठे।

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Power comes through Innocent children परेशानियों का एकमात्र हल क्या है ? - Anwer Jamal
बच्चे में झलकता है ईश्वरीय स्वरूप

कठिन तपस्याओं से सिद्धि मिल सकती है, शक्ति मिल सकती है लेकिन सत्य का बोध नहीं मिलता, अपने मूल स्वरूप का बोध नहीं होता। सत्य का, अपने मूल स्वरूप का बोध होता है केवल ईश्वर की कृपा से और उसकी ओर से यह कृपा इनसान हर पल बरसती रहती है लेकिन इनसान उसकी कृपा को समेट नहीं पाता। बच्चा ईश्वर की कृपा है, उसका वरदान और उसका उपहार है, उसकी कुदरत का निशान है, मानव जाति के नाम उसका एक पैग़ाम है। बच्चा मानवता का आदर्श है क्योंकि बच्चा निर्दोष, निष्कलंक और निष्पाप होता है। ये वे गुण हैं जो ईश्वरीय गुण हैं। हम समझ ही नहीं पाते कि ईश्वर ने अपने स्वरूप पर इनसान की रचना की, उसने इनसान को पवित्र और पापमुक्त पैदा किया, उसे कितना बड़ा रूतबा दिया ?
ध्यान और स्मृति की सहज रीति
हरेक रचना में रचनाकार का ‘थॉट‘ ज़रूर शामिल होता है। रचनाएं अपने रचनाकर की योग्यता का भी प्रमाण होती हैं। रचनाओं में संदेश भी छिपे होते हैं। रचनाकार के ‘थॉट‘ और उसके संदेश को समझने के लिए रचनाओं पर ‘ध्यान‘ देने और उनपर ‘विचार‘ करने की ज़रूरत होती है। सृष्टि ईश्वर की रचना है। हर चीज़ पर ‘ध्यान‘ दीजिए, विचार कीजिए। ईश्वर की स्मृति सहज ही बनी रहेगी।
विश्वास से मांगिए, आपको मिलेगा
बच्चे पर विशेष ध्यान देंगे तो आपको अपने मूल स्वरूप का बोध भी सहज ही हो जाएगा। जो उग्र तपस्याओं से नहीं मिलता, वह आपको सहज ही मिल जाएगा। बच्चा मासूम है, कमज़ोर है, अपने मां-बाप पर निर्भर है। उसे विश्वास है कि मां-बाप उसे प्यार करते हैं, उसका भला चाहते हैं। वह मां-बाप का कहना मानता है और तब उसे जो चाहिए होता है, वह उनसे मांगता है और उसे मिलता है। जो विश्वास बच्चा अपने मां-बाप पर रखता है और जैसे उनकी उंगली पकड़कर चलता है, क्या हम भी ऐसा ही विश्वास अपने पालनहार पर रखते हैं ? क्या हम उसके सहारे उसके बताए हुए रास्ते पर चलते हैं ?
परेशानियों का एकमात्र हल क्या है ?
यह बात खुद से पूछने की ज़रूरत है। अगर हम ऐसा करते तो खुद को पापमुक्त रख सकते थे, हम अपनी मासूमियत को बचा सकते थे। हमने अपने मूल स्वरूप को खो दिया है इसीलिए अशांत और परेशान हैं। अपने मूल स्वरूप पर लौट आइये, आपकी सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी, आपको सच्ची शांति मिल जाएगी।
समस्या जटिल है लेकिन हल सरल है। इनसान जानता है लेकिन टालता है। सादा सी बात को सादे अंदाज़ में नहीं कहा। नतीजा यह हुआ कि एक के बाद एक दर्शनों की भीड़ लगती चली गई और लोगों को अमल करना तो दूर बात समझना ही दुश्वार हो गया। दर्शन को समझना भी ‘ज्ञानियों‘ के लिए छोड़ दिया गया। ‘ज्ञानी लोग‘ ईश्वर के गुणों पर तर्क-वितर्क करते रहे। निर्गुण-सगुण, निराकार-साकार के भेद खड़े हुए, मत बने, मठ बने। सब कुछ हुआ लेकिन हरेक भारतीय को ‘ईमान‘ नसीब नहीं हुआ। आज भी विश्व के भ्रष्ट देशों की सूची में भारत का नाम दर्ज है।
इनसान का कर्तव्य और उसकी परीक्षा क्या है ?
हम भ्रष्ट हैं, यही हमारी समस्या है और यह खुद भी बहुत सी समस्याओं का मूल है। हम ‘ईमानदार‘
बनें हमारी समस्याएं ख़त्म हो जाएंगी लेकिन यह ईमानदारी सामूहिक रूप से आये सारे समाज में तब होंगी समस्याएं ख़त्म वर्ना तो समस्याएं और बढ़ जाएंगी। ईमानदार बनने का अर्थ यही है कि बेईमानी न की जाए। केवल समाज के लोगों से ही नहीं बल्कि अपने रचनाकार से भी बेईमानी न की जाए। उसने जैसा निष्पाप हमें पैदा करके इस जग में भेजा था वैसा ही निष्पाप हम खुद को इस जग से ले जाएं। यही इनसान का कर्तव्य है, यही उसकी परीक्षा है।
खुद को बदलिए, दशा खुद बदल जाएगी
हम ध्यान ही नहीं देते। नतीजा यह है कि हम अपने कर्तव्य से ग़ाफ़िल हैं और परीक्षा में फ़ेल हैं। जिस हालत में हम जी रहे हैं, उसी में हम मरेंगे। हम फ़ेल होकर जी रहे हैं और फ़ेल होकर मर रहे हैं। हमारी दशा बदल सकती है, बशर्ते कि हम खुद को बदल दें।
खुद को बदलकर कैसा बनाएं ?
खुद को बदलकर बच्चों जैसा बनाएं। हम अस्ल में बच्चे ही हैं। हमारे अंदर हमेशा एक बच्चा रहता है। बुढ़ापे में तो हमारा बाहरी वजूद भी बच्चों जैसा ही हो जाता है। हमारे घर में बूढ़े मां-बाप भी होते हैं। जब तक वे हमारे सिर पर रहते हैं। हम खुद को बच्चा ही फ़ील करते हैं, चाहे हम कितने ही बड़े हो जाएं। वे भी हमें बच्चा ही समझते हैं चाहे खुद हमारे ही कई बच्चे क्यों न हो चुके हों, तब भी।
बच्चों को बिगाड़ते हैं उनके बड़े
ईश्वर की यह योजना क्यों है ?
ताकि इनसान को उसके मूल स्वरूप का बोध बना रहे, ताकि इनसान इनसान बना रहे। जो बच्चों की परवरिश और बड़े-बूढ़ों की सेवा करता है वह खुद अपना ही भला करता है। जिनके साथ हम ज़्यादा से ज़्यादा रहते हैं, हम खुद वैसे ही बन जाते हैं लेकिन इसके लिए नीयत और कोशिश होना लाज़िमी है वर्ना इसका उल्टा भी हो जाता है यानि ऐसा भी हो सकता है कि हम तो बच्चों जैसे न बन पाएं बल्कि बच्चों को अपने जैसा बना दें। आज हो भी यही रहा है। बच्चों को झूठ बोलना खुद उनके बड़े ही सिखाते हैं। जैसे हम खुद हैं अपने बच्चों को भी वैसा ही बनाते हैं।
ये हम क्या कर रहे हैं ?
कुफ़्र क्या है और काफ़िर किसे कहते हैं ?
हम वर्तमान हैं और बच्चे हमारा भविष्य हैं। हम तो खुद को तबाह कर ही चुके हैं अब अपने बच्चों को पाप में धकेलकर मानव जाति का भविष्य भी चैपट कर रहे हैं। बालश्रम भी बच्चों से उनका बचपन छीन रहा है, बच्चों का यौन शोषण भी आज एक समस्या है और बच्चों के साथ क्रूर व्यवहार तो हर घर में आम बात है। यह हमारा बर्ताव है ईश्वर की रचना के साथ, उसकी कृपा के साथ। नाशुक्री किसे कहते हैं ? नास्तिकता क्या होती है ? इसी को अरबी में कुफ़्र कहते हैं और कुफ़्र करने वाले को काफ़िर कहते हैं। यह कोई गाली नहीं है बल्कि एक हालत है इंसान की, जिससे बचने की ज़रूरत है, न सिर्फ़ व्यक्तिगत रूप से बल्कि सामूहिक रूप से।
ईमान किसे कहते हैं ?
बचने का तरीक़ा बस यही है कि एक बच्चे की तरह हम उस मालिक पर पूरा भरोसा करें, उसकी बात को मानें और उसके बताए हुए सीधे मार्ग पर चलें। हम विश्वास रखें कि इसी में हमारा कल्याण और हमारी सफलता है। विश्वास को ही अरबी में ‘ईमान‘ कहते हैं। दूसरे देश एटम बम बनाकर खुद को शक्तिशाली बना रहे हैं लेकिन उनके दिल ईमान से खाली हैं, वे अंदर से खोखले हो चुके हैं।
हम अपने देश के नागरिकों में ईमान की चेतना जगाएं, विश्वास की शक्ति बढ़ाएं और तब हथियार वाले देश हमसे कहेंगे कि
 यह तकनीक हमें भी सिखा दीजिए, तब हमारा देश बनेगा ‘विश्वगुरू‘।हम देंगे दुनिया को ‘शांति का विधान‘
बच्चों को बच्चा ही रहने दीजिए, खुद को उन जैसा बनाइये और यही ज्ञान दुनिया में फैलाइये। दुनिया में शांति लाईये क्योंकि आज सारी दुनिया को शांति चाहिए। हम दे सकते हैं दुनिया को वह जो कि उसे चाहिए क्योंकि ‘शांति का विधान‘ हमारे पास है। दुनिया में सबसे ज़्यादा बच्चे हमारे पास हैं। यही एक बात ऐसी है जिसमें हम विश्व में नम्बर वन हैं। बच्चों की ही बदौलत आने वाला समय हमारा है। बच्चे सचमुच ही ईश्वर का वरदान होते हैं। यह अब सिद्ध होने जा रहा है।
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A dialogue with Mr. Rakesh lal, christian representative आप बच्चों को क्या मानते हैं, मासूम या दुष्ट पापी ? - Anwer Jamal
मेरे प्यारे भाई राकेश लाल जी ! आपने पहले ऐतराज़ जताया था कि पवित्र कुरआन में हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम  का नाम ग़लत तरीक़े से आया है। फिर उसके बाद आपने कुरआन पाक की बहुत सी आयतें पेश कीं जिनमें हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम की पवित्रता और सच्चाई का बयान आया है। आपने उन आयतों को पेश करके
मुसलमानों से अपील की है कि वे कुरआन की आयतों को मान लें।
मुझे इस संबंध में यह कहना है कि
1. जब आप मानते हैं कि पवित्र कुरआन में हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम का नाम ग़लत तरीक़े से आया है तो आप क्यों चाहते हैं कि मुसलमान उन्हें मान लें ?
2. अगर आप चाहते हैं कि मुसलमान कुरआन में आये हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम के बयान को सही मान लें तो फिर आप पर लाज़िम है कि आप खुद भी उसे मान लें। क्या आप मानते हैं ?
3. यदि आप कुरआन को नहीं मानते तो फिर आप क्यों चाहते हैं कि मुसलमान उसे मान लें जिसे आप खुद नहीं मानते ?
4. आप इंजील (Gospel) को मानते हैं लेकिन आपने मुसलमानों से नहीं कहा कि वे इंजील को मान लें, क्यों नहीं कहा ?
5. अब आपको यह जानकर बेहद खुशी होगी कि मुसलमान चाहे वह अमल में कितना ही कमज़ोर क्यों न हो तब भी कुरआन को पूरा सत्य मानता है और उसमें आये हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बयान को भी मानता है।
6. इससे भी ज़्यादा खुशी आपको यह जानकर होगी कि मुसलमान इंजील को भी पवित्र और सच्चा मानता है और ज़बूर व तौरात आदि को भी।
7. हज़रत ईसा मसीह हिब्रू भाषा बोलते थे लेकिन आज इंजील की सबसे पुरानी प्रति हिब्रू में नहीं पाई जाती। असली इंजील कहां है ?
8. एक वेद के चार वेद बन चुके हैं ठीक ऐसे ही एक इंजील की चार इंजीलें कैसे बन गईं ?
9. एक ही घटना को अलग-अलग इंजील में बिल्कुल जुदा क्यों लिखा गया जैसे कि हज़रत ईसा मसीह की वंशावली ?  मत्ती 1, 1 और लूका 3, 24 में हज़रत ईसा मसीह तक उनके पूर्वजों के नाम और पीढ़ियों का अंतर क्यों हैं ?
10. मुसलमान मानते हैं कि इंजील में ईसाई भाईयों ने मिलावटें की हैं, क्या आप उनकी इस बात को सही मानते हैं या ग़लत ?
11. प्रोटेस्टेंट मत वाले बाइबिल से 7 किताबें ‘जाली‘ कहकर निकाल दीं। क्या उन्होंने सही किया ?
11. आप रोमन कैथोलिक बाइबिल को उन 7 किताबों सहित ठीक मानते हैं या 7 किताबों कम वाली प्रोटेस्टेंट बाइबिल को , या फिर आपकी बाइबिल इन दोनों से ही अलग है ?
12. एक सवाल यह है कि आप मेरे ब्लॉग पर आते हैं और अपना ऐतराज़ जताकर या निमंत्रण देकर चले जाते हैं लेकिन मेरे किसी सवाल का जवाब आप नहीं देते क्यों ?
13. आप जवाब नहीं देंगे तो हम आप से संवाद कैसे कर पाएंगे ?
14. अब दुनिया बहुत होशियार हो गई है। वह किसी भी बात को केवल इसीलिए नहीं मान लेगी कि किसी ने किसी किताब या सिंद्धात को ईश्वर की ओर से कह दिया है। अब दुनिया दावे को पहले परखना चाहती है। क्या आप इस परीक्षा के लिए तैयार हैं ?
15.मुसलमान आवागमन को नहीं मानता , इसी दुनिया में बार बार पैदाइश को नहीं मानता इसलिए बच्चों को मासूम मानता है.  आप बच्चों को क्या मानते हैं, मुसलमानों की तरह मासूम या आवागमन में विश्वास रखने वाले हिन्दू भाईयों की तरह की तरह जन्मजात पापी ?
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Utilty of christian rituals for children अगर बच्चा अपनी मासूमियत की वजह से स्वर्ग का अधिकारी है तो फिर उसे ईसा मसीह के नाम का बपतिस्मा लेकर क्या फ़ायदा होता है ? - Anwer Jamal
भाई राकेश लाल जी ! आपने कुरआन पढ़ना शुरू कर दिया है, बेशक यह आपकी एक बड़ी उपलब्धि है। आपके पास एक-दो हिन्दी किताबें भी हैं, जिनमें से आपने ‘पेस्ट‘ करके मेरी पिछली पोस्ट ‘वेस्ट‘ कर दी। आप ईसाईयत के प्रचारक हैं, मैं आपका उत्साह समझ सकता हूं। आप ब्लागिंग में नये हैं। यह भी ठीक है लेकिन उम्र तो आपकी ठीक-ठाक है। मैंने आपसे यह नहीं पूछा था कि कुरआन में ईसा मसीह अलैहिस्सलाम का ज़िक्र कहां-कहां आया है, बल्कि मैंने आपसे यह पूछा था कि
1. जिस कुरआन को मानने की दावत आप मुसलमानों को दे रहे हैं, क्या आप उस कुरआन को खुद भी मानते हैं ?
2. मुसलमान आवागमन को नहीं मानते और सभी बच्चों को पैदायशी तौर पर मासूम मानते हैं, आप बच्चों को क्या मानते हैं, मुसलमानों की तरह मासूम या ‘मूल पाप‘ का बोझ ढोने वाला दोषी ?
3. जिस बाइबिल को आप मानते हैं उसमें रोमन कैथोलिक बाइबिल से कुल कितनी किताबें कम हैं ?
आपसे ज़्यादा सवाल नहीं करूंगा।
पहले आप इन सवालों के जवाब दीजिए। फिर मैं आपको कुरआन पढ़ाऊंगा और आपको आपकी ‘पेस्ट‘ की हुई आयतों के अनुवाद के बारे में सही-सही बताऊंगा। आपने सिर्फ़ अनुवाद ‘पेस्ट‘ कर दिया न उसे पढ़ा और न ही उसे समझा।
आपने खुद पेस्ट किया कि ‘3 : 52 अल्लाह के नजदीक ईसा अ0 का जन्म ऐसा ही है जैसा हजरत आदम का जन्म।'
क- जब कुरआन में साफ़ आया है कि ‘ईसा की मिसाल आदम जैसी है।‘ तो आप खुद सोच लीजिए कि जब आदम खुदा नहीं हैं तो उनकी मिसाल वाला आदमी कैसे खुदा हो जाएगा ?
ख- कुरआन में आया है कि जन्नत में वही आदमी जाएगा जिसने अपनी ख्वाहिशें खुदा के हुक्म के अधीन कर दी होंगी, खुदा के हुक्म का पालन किया होगा, खुद को खुदा के प्रति समर्पित कर दिया होगा। ऐसे ही आदमी को मुस्लिम कहा जाता है, मुसलमान शब्द फ़ारसी में मुस्लिम अर्थात समर्पित के लिए ही बोला जाता है।
आपने कह दिया कि सारे मुसलमान जहन्नम में जाएंगे, ऐसा कुरआन कहता है। आपने एक ऐसी बात कह दी जिसे आज तक पत्रक छापने और बांटने वाले हिन्दुओं में से भी किसी ने न कहा बल्कि उल्टे उन्हें यह शिकायत है कि मुसलमान अपने अलावा किसी को जन्नत में जाने का पात्र क्यों नहीं मानता ?
ग- आप मानते हैं कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम मर चुके हैं। जो मर जाए वह खुदा नहीं होता। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की दोबारा आमद केवल इसीलिए होगी कि वे लोगों के ज़ुल्म और मारपीट की वजह से बेहोश हो गए थे, दूर से देखने वालों ने उनकी बेहोशी को मौत समझ लिया। वे ज़िन्दा थे जब गुफ़ा में उन्हें चादर लपेटकर रखा गया क्योंकि हज़रत यूनूस भी मछली के पेट में ज़िन्दा थे और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने बताया था कि लोगों को मेरी सच्चाई के तौर पर ‘साइन आफ़ जोनाह‘ यानि कि हज़रत यूनुस का चिन्ह दिया जाएगा।
ये सारी बातें आपको धीरे-धीरे बताई जाएंगी। आप बिल्कुल ठीक जगह पर आ गए हैं। अब आप यहां से पीछा छुड़ाकर जाना भी चाहें तो आपको जाने नहीं दिया जाएगा। मैं बिल्कुल भी नाराज़ नहीं हूं। मैं आपके आने से बहुत खुश हूं। बस आपसे एक विनती करना चाहूंगा कि आप कमेंट करने से पहले यह ज़रूर देख लिया कीजिए कि आपसे पूछा क्या जा रहा है ?
देखो समय क्या कह रहा है ?

        जो समाज ईश्वर के नियमों को  नहीं मानता और जीवन को खेल की तरह गुज़ारता है, धर्म की जगह संस्कृति और राष्ट्र को दे बैठता है उसके राष्ट्र में विदेशी आकर ‘मौज‘ करते हैं और
उसकी ‘मां‘ जैसी धरती पर ऐसी चीज़ें इतनी मात्रा में डाल देते हैं कि टॉयलेट भी अट जाते हैं। इस ज़िल्लत को न तो वे किसी से शेयर कर पाते हैं और न ही उन्हें इस ज़िल्लत से मुक्ति का कोई मार्ग ही नज़र आता है क्योंकि जो मार्ग होता है उसकी मज़ाक़ उड़ाना तो उनका मिशन होता है। समय उनकी मज़ाक़ उड़ाता है और वे फिर भी मालिक की शरण में नहीं आते।
अफ़सोस, हज़ार बार अफ़सोस।
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The ultimate way for women दुनिया को किसने बताया की विधवा और छोड़ी हुई औरत का पुनर्विवाह धर्मसम्मत है ? - Anwer Jamal
सुज्ञ जी ! आपने अपने नाम के अर्थ के बारे में बताया अच्छा लगा। आप अच्छे ज्ञान को पाना चाहते हैं तो आपको ‘सम्यकदृष्टि‘ की ज़रूरत पड़ेगी। सम्यकदृष्टि के लिए ‘सम्यकबुद्धि‘ की ज़रूरत होगी। सम्यकबुद्धि पाने के लिए आदमी को पूर्वाग्रह छोड़ना पड़ता है।

1.आप अपना दिल निर्मल रखते हैं ऐसा आपने बताया लेकिन ‘ईश्वर‘ या ‘मुसलमानों के ईश्वर‘ के लिए दिल में मैल रखते हैं ?
आप ईश्वर को दोग़ला व्यवहार करने वाला बता रहे हैं ?
देखिए अपना कथन-

    अब प्रश्न होता है, अल्लाह ने मुहम्मद सल्ल को ही पूरी मानवता की किताब क्यों दी,अन्तिम इन्हें ही क्यो दी? मूसा, ईशा को को छोटे टुकडो में कौम लिमिटेड क्यों दी? ईशा को ही अन्तिम क्यों न बनाया। क्या वैर था ईशा आदि से? कुरआन की सुरक्षा तो अल्लाह खुद कर रहा है, और तौरेत, इंजिल आदि को बिगडने दिया?क्यों…क्या वे किताबें अल्ल्लाह को प्यारी नहिं थी?


    या उस एडिशन में अल्लाह से चुक हुई थी, जो फ़ाईनल एडिशन निकालना पडा। और यह विशेष कौम के लिये नहिं तो भाषा अरबी ही क्यों पूरी मानवता के लिये?
    अल्लाह का अरबी,कुराआन,मुहम्मद सल्ल से विशेष लगाव है? तो फ़िर आदम से लेकर ईशा तक के साथ दोगला व्यवहार क्यो?

क्या आपने कभी अपने तीर्थंकरों के लिए ‘दोग़ला‘ शब्द इस्तेमाल किया ?
ईश्वर के व्यवहार में ‘दोग़लापन‘ समझने वाले इस शब्द को अपने माननीय जनों के लिए इस्तेमाल नहीं करते। यह है उनका खुद का दोग़लापन।
सुज्ञ जी ! आप अपने लिए केवल 'ले लो' सुज्ञ जी के सवालों का भी नंबर , पर भी ऐतराज़ करते हैं और खुद इश्वर के बारे मन दोगला शब्द यूज़ करते हैं , निहायत दुःख की बात है .

2.मैं प्रतिप्रश्न क्यों करता हूं ?
आपने यह भी पूछा है। मैं प्रतिप्रश्न इसीलिए करता हूं कि आज का इनसान जानबूझ-बावला बना हुआ है। अपने और अपनी मान्यताओं के प्रति पूरी तरह संवेदनशील है, अपने ग्रंथों में आये हुए युद्धों के बारे में कहता रहता है कि वे न्याय और मानवता के हितार्थ लड़े गए और कुरआन में आक्रमणकारी दुश्मनों को खदेड़ भगाने के आदेशों पर तुरंत आपत्ति जताने लगता है। एक पूरा ग्रंथ तो केवल ‘युद्ध के उपदेश‘ पर ही केन्द्रित है, उसे मानते हैं और कुरआन की चन्द युद्ध संबंधी आयतों पर ऐतराज़ करते हैं ?
आपके साथ भी यही समस्या है। आप ऋषभ देव जी से लेकर महावीर जी तक बहुत से आदमियों को तीर्थंकर मानते हैं। सभी जैन तीर्थंकर एक साथ नहीं आए बल्कि एक के बाद एक आए। जब किसी तीर्थंकर के जन्म लेने के लिए अनुकूल हालात बन गए होंगे या उनकी ज़रूरत होगी तभी उनका जन्म हुआ होगा। इसे समझा जा सकता है।

नबी मानव जाति के लिए आदर्श शिक्षक हैं
आप भी समझ सकते थे कि मानव जाति धरती के बहुत बड़े भाग पर फैली हुई है। हर जगह एक ही नबी का पहुंच सकना संभव नहीं था। सो बहुत से नबी आए, मानव जाति के सामने अपने अमल से मिसाल क़ायम की और लोगों को उसके अनुसार चलना सिखाया। जब मानव जाति उनके चरित्र को भुला बैठी तब फिर ईश्वर की ओर से नबी आया और भूला हुआ पाठ फिर याद दिलाया। जब लोगों को सुदूर देशों के रास्तों का पता चल गया और आवागमन के साधन भी विकसित हो गए तो फिर नबियों को दूसरे देशों तक भी भेजा गया। सबसे अंत में हज़रत मुहम्मद साहब स. को ईश्वर ने मानव जाति के लिए आदर्श और गुरू बनाकर खड़ा किया। ‘ईश्वर की योजना और आदेश का ज्ञान‘ आज उनके माध्यम से सारी जाति को पहुंच रहा है। उस ‘ज्ञान‘ का नाम कुरआन है।

कुरआन में क्या है ?
3. कुरआन में केवल हज़रत मुहम्मद साहब स. का ही ज़िक्र नहीं है बल्कि उनसे पहले आ चुके नबियों का भी ज़िक्र है और हज़रत मुहम्मद साहब स. अपनी हर नमाज़ में अल्लाह से यह दुआ अनिवार्य रूप से करते थे कि ‘दिखा और चला हमें सीधा मार्ग। उन लोगों का मार्ग जिन पर तेरा ईनाम हुआ।‘ (अलफ़ातिहा)
इसी दुआ को उन्होंने अपने मानने वालों को सिखाया और बताया कि ‘दुआ इबादत का मग़ज़ अर्थात सार है‘ और यह भी कहा कि ‘फ़ातिहा के बिना कोई नमाज़ नहीं‘।
ज़रा सोचिए कि जो मानव जाति के लिए आदर्श है वह ईश्वर से अपने पूर्व उसका ईनाम पाने वालों का रास्ता दिखाने-चलाने की दुआ कर रहा है। अगर वे सच्चे-अच्छे और आदर्श न होते तो क्या यह संभव था ?

पिछले नबी भी सारी मानव जाति के लिए आदर्श हैं
4.अल्लाह कहता है कि ‘तुम्हारे लिए इबराहीम और उसके साथियों में अच्छा नमूना (आदर्श) है।‘ (कुरआन, 60, 4)
इसी के साथ उसने मुसलमानों को यह कहने की ताकीद की है कि ‘रसूल ईमान लाया है उस पर जो उसके रब की तरफ़ से उस पर उतरा है। और मुसलमान भी उस पर ईमान लाए हैं। सब ईमान लाए हैं अल्लाह पर और उसके रसूलों पर। हम उसके रसूलों में से किसी के दरम्यान फ़र्क़ नहीं करते।‘ (कुरआन, 2, 285)

सिर्फ़ नबी ही नहीं बल्कि उनका साथ देने वाले भी आदर्श होते हैं और मालिक से ईनाम पाते हैं। सभी नबी आपस में एक दूसरे को मानते हैं। पहले आने वाले नबी अपने बाद आने वाले नबियों की खब़र देते हैं और उनके बाद आने वाले नबी उनकी पुष्टि और समर्थन करते हैं और जिस काम को उन्होंने किया था उसे आगे बढ़ाते हैं और पूरा करते हैं। यही वजह है कि हज़रत मुहम्मद साहब स. ने अपने से पहले आ चुके तमाम नबियों की सच्चाई की पुष्टि की, उनके लिए दुआ की और करना सिखाया। पिछले नबियों की किताबों में आज भी हज़रत मुहम्मद साहब स. के आने की भविष्यवाणियां देखी जा सकती हैं।

फिर फ़र्क़ क्या है ?
फ़र्क़ यह है कि हम दिखाते हैं और वे छिपाते हैं। कुरआन में पिछले नबियों का ज़िक्र आया है हम तो सबको दिखाते हैं जबकि वे छिपाते हैं कि हमारे ग्रंथों में ‘मुहम्मद‘ स. का ज़िक्र मौजूद है। फ़र्क़ यह है कि कुरआन ‘सुरक्षित‘ है और वे अपनी किताबों में अपना इतिहास और दर्शन मिलाकर उसे विकृत कर बैठे हैं। अब वे उस नबी या ऋषि के आदर्श का अनुसरण भी नहीं कर रहे हैं जिसे मानने का वे ज़बानी दावा करते हैं क्योंकि अगर वे उनका अनुसरण करना भी चाहें तो नहीं कर सकते।
मिसाल के तौर पर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम और हज़रत मुहम्मद साहब स. के दरम्यान 600 साल से भी कम का फ़र्क़ है लेकिन ईसाई हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर अवतरित ईश्वर की वाणी को विकृत कर बैठे। उसमें हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को शराब पीते हुए और पिलाते हुए लिख दिया गया। (देखिए यूहन्ना, 2)

हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के मुंह से कहलवा दिया गया कि ‘जितने मुझसे पहले आए, वे सब चोर और डाकू थे।‘ (देखिए यूहन्ना, 10, 7)

जबकि हज़रत ईसा अ. ने अपने से पहले आ चुके नबियों के बारे में कहा था कि ‘यह न समझो कि मैं धर्म-व्यवस्था या नबियों की शिक्षाओं को मिटाने आया हूं। मैं उनको मिटाने नहीं, परंतु पूरा करने आया हूं।‘ (देखिए मत्ती, 17 व 18)
यीशु ने उसे उत्तर दिया, ‘‘सब आज्ञाओं में यह मुख्य है : ‘हे इस्राएल सुन, हमारा प्रभु परमेश्वर एक ही प्रभु परमेश्वर एक ही प्रभु है। तू प्रभु अपने परमेश्वर से से अपने सारे मन, अपने सारे प्राण, अपनी सारी बुद्धि और अपनी सारी शक्ति से प्रेम करना।‘
(देखिए मरकुस, 12, 29 व 30)
अब अगर ईसाई भाई-बहन चाहें भी तो बाइबिल के आधार पर केवल एक प्रभु परमेश्वर की उपासना नहीं कर सकते जिसकी ईसा अ. सदा करते रहे। ईसा अ. से पहले आ चुके नबियों को मानने वालों की हालत और भी ज़्यादा ख़राब है। वेदों में मिलने वाले आर्य राजा इन्द्र आदि के क़िस्सों से भी इसकी पुष्टि होती है।

ईश्वर की दया से कुरआन का अवतरण
ऐसे में जबकि मानवता अपने ऊपर ‘ज्ञान‘ का दरवाज़ा ही बन्द कर चुकी थी तब उस मालिक ने केवल अपनी दया से लोगों के मार्गदर्शन के लिए हज़रत मुहम्मद स. को इस दुनिया में भेजा और कुरआन की सुरक्षा का प्रबंध कर दिया क्योंकि जगत का अंत अब क़रीब है और नया नबी अब कोई आएगा नहीं। अब केवल कुरआन सुरक्षित है, उसमें सच्चे मालिक का सही कलाम सुरक्षित है जो उसे नहीं मानता वह खुद को केवल हज़रत मुहम्मद साहब स. के अनुसरण से ही वंचित नहीं करता बल्कि उन नबियों-ऋषियों के अनुसरण से भी वंचित करता है जिनमें वह विश्वास का दावा करता है।

आचरण ही विश्वास का प्रमाण है और अब अपने ऋषियों के आदर्श के अनुसरण आचरण कर नहीं सकता क्योंकि आदर्श सुरक्षित ही नहीं बचे। प्रायः सारी मानव जाति आज हज़रत मुहम्मद साहब स. का अन्जाने में अनुसरण कर रही है। यह उसकी मजबूरी है लेकिन अगर इसी काम को वह ‘राज़ी-खुशी‘ कर ले तो इसी का नाम ईमान और नेक अमल हो जाएगा जिस पर उसे मालिक की तरफ़ से ईनाम मिलेगा दुनिया में भी और परलोक में भी।

व्यवस्था दुनिया ले रही है हज़रत मुहम्मद स. से
मिसाल के तौर पर वेदों में विधवा औरत के लिए पुनर्विवाह के बजाय ‘नियोग‘ आया है (सत्यार्थप्रकाश, चतुर्थसमुल्लास, पृ. 95-103)
और हज़रत ईसा अ. की ओर से इंजील में कहा गया है कि ‘मैं तुमसे कहता हूं, जो पति व्यभिचार को छोड़ और किसी कारण से , अपनी पत्नी को त्यागकर , दूसरी स्त्री से विवाह करता है, वह व्यभिचार करता है। और जो पुरूष उस छोड़ी हुई से विवाह करता है, वह भी व्यभिचार करता है।‘
1. क्या मानव जाति आज वेद या इंजील की व्यवस्था का पालन कर सकती है ?
2. क्या विधवा औरत और त्यागी हुई औरत के लिए आदर्श व्यवस्था ‘पुनर्विवाह‘ नहीं है ?
3. किसने दी है औरत को पुनर्विवाह की व्यवस्था ?
हज़रत मुहम्मद स. सारी मानव जाति के लिए आदर्श हैं। उनका अनुसरण करना सहज है, उनकी शिक्षा व्यवहारिक है। यदि कोई इस बात से संतुष्ट न हो तो वह बताए कि तब सारी मानव जाति के लिए आज कौन आदर्श है और उसका चरित्र किस ग्रंथ में सुरक्षित है ?

आदमी की आत्मा सत्य की गवाही देती है
मैं इसलिए भी प्रतिप्रश्न करता हूं कि उसके जवाब में संबोधित व्यक्ति का दिमाग़ तुरंत सोचना शुरू कर देता है और उसके मन की गहराई में दबे हुए विचार उभरकर ऊपर आ जाते हैं। उनमें जो सटीक होता है उसे वह जान लेता है चाहे वह हमारे सामने न माने लेकिन मालिक तो दिलों का भी हाल जानता है। जानकर भी जो नहीं मानता उसे ही लोग जानबूझ-बावला बनना कहते हैं। केवल अपने हठ और अहंकार से ही आदमी इस हीन दशा को पहुंचता है।
आदमी को कुछ भी सम्यक हासिल नहीं हो सकता अगर उसे ‘सम्यक ज्ञान‘ नहीं है। सम्यक ज्ञान केवल ईश्वर ही दे सकता है और उसने बहुत बार दिया लेकिन लोगों ने उसकी क़द्र न की जैसी कि उसकी क़द्र करने का हक़ था। उसने फिर ‘कुरआन‘ के माध्यम से ‘सम्यक ज्ञान‘ दिया है। अब इस आखि़री मौक़े को गंवाना बुद्धिमानी नहीं है।

आपने पूछा है कि वेद, बाइबिल और कुरआन का भोजन मेन्यु क्या है ?
मैं आपको बताना चाहूंगा कि आयटम्स की संख्या तो बहुत लम्बी है लेकिन आप इतना जान लें कि इनके मेन्यु में ‘मांस‘ समान रूप से शामिल है।

धर्म का पालन ऐच्छिक नहीं बल्कि अनिवार्य होता है
जनाब राकेश लाल जी ! मैं संबोधित तो भाई सुज्ञ को कर रहा था लेकिन समझ आप भी गए होंगे, क्यों ?
आप धर्म को चाय-कॉफ़ी की तरह मामूली चीज़ मानते हैं क्योंकि वह आपको अभी तक प्राप्त ही नहीं हुआ है। मैं चाय और कॉफ़ी दोनों पीता हूं और कोई आदमी दोनों ही नहीं पीता। आप कहते हैं कि हरेक आदमी अपनी पसंद के मुताबिक़ चाय या कॉफ़ी की तरह किसी भी धर्म पर चल सकता है। आप अपनी बात को इंजील से प्रमाणित करें। है कोई प्रमाण ?
यीशु तो कहते हैं कि ‘मार्ग, जीवन और सच्चाई मैं ही हूं। बिना मेरे द्वारा पिता के पास कोई नहीं जा सकता।‘ (यूहन्ना, 14, 6)

मूर्तिपूजा का आग्रह क्यों ?
भाई रविन्द्र जी ! आपका हिन्दू धर्मग्रंथों से मोह भंग हो चुका है इसके बावजूद आप मूर्तिपूजा के पक्ष में बोलते रहते हैं। आपने कैरानवी साहब को संबोधित करके उनसे कहा है कि वे मुझे समझाएं कि ‘साधकों के लिए शुरू में ध्यान जमाने के लिए मूर्ति ज़रूरी है।‘ जैसे राकेश लाल जी को धर्म की प्राप्ति न हो सकी ऐसी ही हालत आपकी भी है। अगर आपको शुद्ध धर्म का ज्ञान होता तो आप जानते कि इनसान स्वयं एक जीवित मूर्ति है और उसका अपना वजूद ध्यान जमाने के लिए श्रेष्ठ है। इसमें बहुत से सूक्ष्म चक्र हैं। साधक उनपर भी ध्यान जमा सकता है। अपनी नाक के अगले हिस्से पर भी ध्यान जमा सकता है जैसा कि गीता (6, 13) में बताया गया है-
‘सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानकलोकयन्।‘
अर्थात नाक के अगले सिरे पर दृष्टि लगाए और किसी दिशा में न देखे।
इस तरह ध्यान जमाने के लिए एक श्रेष्ठ माध्यम भी मिल जाता है और इसकी इजाज़त भी है तब क्यों मूर्ति पर ही ध्यान लगाने का आग्रह किया जाए ?
जबकि मूर्ति पर तो चढ़ावे आदि चढ़ाए जाते हैं, उनपर कोई ध्यान तो जमाता ही नहीं और जब कोई ध्यान जमाएगा तो आंखें खुद-ब-खुद मुंद जाएंगी। बंद आंखों के लिए किसी मूर्ति का होना या न होना बराबर है, क्यों बात सही है कि नहीं ?
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What was the real mission of Christ मसीह का मिशन था ‘सत्य पर गवाही देना‘ - Anwer Jamal
What was the real mission of Christ  and who did complete it ?
ईसाई प्रचारक ख़ामोश क्यों हैं ?
जनाब राकेश लाल जी ने तो अब मेरे ब्लॉग पर ज़ाहिर होना ही छोड़ दिया। अब कुमारम जी के नाम से कोई आ रहा है और एक भाई भगवत प्रसाद मिश्रा जी और नमूदार हुए हैं लेकिन मेरे सवालों का जवाब इनमें से कोई भी नहीं दे रहा है। ये क्या जवाब देंगे ?
जवाब तो पादरी राकेश चार्ली जी भी न दे सके। आज पेश है उनसे मुलाक़ात और बातचीत का हाल। उम्मीद है पसंद आने के साथ-साथ आपका ज्ञान भी बढ़ेगा।
ईसाई पादरी आये मेरे घर
मुकेश लॉरेंस से मेरी मुलाक़ात महज़ एक इत्तेफ़ाक़ थी। वह एक कम्प्यूटर कम्पोज़िंग के बाद अपने काम का प्रूफ़ निकलवा रहे थे और मुझे भी अपनी बेटी अनम का एक फ़ोटो अपनी कार्ड ड्राइव से डेवलप कराना था। मैंने उनसे चंद मिनटों के लिए उनका काम रोकने की इजाज़त मांगी तो वे खुशदिली का इज़्हार करते हुए फ़ौरन तैयार हो गए। इसी दरम्यान मेरी उनसे बहुत मुख्तसर सी बातचीत हुई। उन्होंने मेरा मोबाईल नम्बर ले लिया। उन्होंने मुझे उर्दू के बेहतरीन शेर  भी सुनाए, जिन्हें किसी और मौक़े पर शायद लिख भी दिया जाए। मुकेश लॉरेंस एक बेहद नर्म मिज़ाज और मिलनसार आदमी हैं और एक अच्छा प्रचारक भी।
जब धर्म चर्चा करें तो अपने बच्चों को अपने साथ रखें
मेरी उनसे मुलाक़ात 28-08-10 को दिन में हुई और शाम को ही उनका फ़ोन आ गया कि अगर मैं उन्हें वक़्त दे सकूं तो वे पादरी साहब को लेकर मेरे घर आना चाहते हैं। मैंने कहा कि मुझे बेहद खुशी होगी, आप रोज़ा इफ़तार हमारे साथ करना चाहें तो इफ्तार के वक्त तशरीफ़ ले आयें वर्ना उसके थोड़ी देर बाद। उन्होंने इफ़तार के बाद साढ़े सात बजे आने के लिये कहा और वे दोनों अपने अपने दुपहिया वाहनों के ज़रिये 7.35 बजे शाम आ भी गये।
मैंने अपने बेटे अनस ख़ान को हिदायत की थी कि बेटे आज खुदा की मुक़द्दस किताब का इल्म रखने वाले दो लोग हमारे घर आ रहे हैं लिहाज़ा जब हमारी गुफ़तगू हो तो आप हमारे पास ही रहना और हमारी बात सुनना।
पादरी व्यवस्था के बजाय मौजज़े पर बल क्यों देते हैं ?
मुकेश लॉरेंस साहब ने पादरी साहब का नाम राकेश चार्ली बताया। वे मैथोडिस्ट चर्च से जुड़े हुए हैं। पादरी साहब जिस्म में थोड़ा हल्के से और उम्र में मुझसे कम थे। उनके अंदर भी मैंने नर्मी देखी।
मैंने उन्हें बाइबिल और नया नियम की प्रतियां दिखाईं। नया नियम को तो मैं पिछले 27 सालों से पढ़ता आ रहा हूं। उन्होंने मुझसे कहा कि वे मुझे अगली मुलाक़ात में नया नियम की उर्दू प्रति देंगे।
मेरी कुछ शुरूआती बात सुनने के बाद वे बोले कि आदमी जब तक मौज्ज़े के ज़रिये ईमान का निजि अनुभव नहीं कर लेता, तब तक वह ईमान को वास्तव में नहीं समझ सकता।
सवाल का संतोषजनक जवाब देना ही ईसा अ.  का  मार्ग है
मैंने अर्ज़ किया-‘देखिये, हरेक का निजी अनुभव अलग हो सकता है। मेरा निजी अनुभव कुछ और हो सकता है और आपका निजी अनुभव कुछ और हो सकता है। इसलिए मेरा निजी अनुभव आपके लिए और आपका निजी अनुभव मेरे लिए दलील नहीं बन सकता। हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम के पास जब कभी यहूदी, फ़रीसी या सदूक़ी कोई भी सवाल लेकर आये तो उन्होंने हमेशा उन्हें ऐसे जवाब दिए जिससे उनकी बुद्धि संतुष्ट हो गई या फिर वे निरूत्तर हो गये। उन्होंने कभी किसी से यह नहीं कहा कि आप किसी चमत्कार या निजी अनुभव के द्वारा सच्चाई को पाने की कोशिश कीजिये।
चमत्कार तो शैतान भी दिखा सकता है लेकिन वह ईश्वरीय व्यवस्था पर नहीं चल सकता
चमत्कार तो लोगों ने मसीह के ज़रिये भी होते देखे और एंटी-क्राइस्ट के ज़रिये भी होते देखेंगे और न्याय दिवस के दिन कुछ ऐसे लोग भी मसीह को हे प्रभु , हे प्रभु कहते हुए उनके पास मदद पाने के लिए पहुंचेंगे जिन्होंने दुनिया में उनके नाम से लोगों को दुष्टात्माओं को निकाला होगा और अजनबी भाषाओं में कलाम किया होगा लेकिन मसीह उन्हें धिक्कार कर भगा देंगे और कहेंगे कि हे पापियों मैंने तो तुम्हें कभी जाना ही नहीं। इसलिए सिर्फ़ चमत्कार ही पैमाना नहीं बन सकता बल्कि उसके साथ यह भी देखा जायेगा कि चमत्कार दिखाने वाला मसीह की तरह शरीअत का पाबंद है या नहीं। एंटी- क्राइस्ट शरीअत का पाबंद नहीं होगा यही उसकी सबसे बड़ी पहचान होगी।
इंजील के हुक्म को न मानने वाले ईसाई कैसे हो सकते हैं ?
मैं इंजील और मसीह में आस्था रखता हूं और आप भी। मैं कुरआन और हज़रत मुहम्मद स. में आस्था रखता हूं लेकिन आप नहीं रखते। सो हमारे आपके दरम्यान इंजील और मसीह कॉमन ग्राउंड है। इसलिए हम दोनों के लिए इंजील और मसीह अलैहिस्सलाम दलील बनेंगे। इनसे न तो मैं भाग सकता हूं और न ही आपको इनसे हटने की इजाज़त दूंगा।‘
पादरी साहब ने माना कि आपकी बात सही है।
मसीह के आने का मक़सद था व्यवस्था को पूरा करना, उस पर खुद चलना और लोगों को चलने की हिदायत करना
मैंने कहा-‘हम पाबंद हैं मसीह के क़ौल के, न कि उनके बाद के सेंट पॉल  आदि आदमियों के। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम कहते हैं कि ‘यह न समझो कि मैं धर्म-व्यवस्था या नबियों की शिक्षाओं को मिटाने आया हूं। मैं उनको मिटाने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूं। मैं तुमसे सच कहता हूं कि जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएं तब तक धर्म-व्यवस्था से एक मात्रा या एक बिन्दु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा। इसलिए जो मनुष्य इन छोटी सी छोटी आज्ञाओं में से किसी एक को तोड़ेगा और वैसा ही लोगों को सिखाएगा कि वे भी तोड़ें तो वह स्वर्ग के राज्य में सबसे छोटा कहलाएगा। परन्तु जो उन आज्ञाओं का पालन करेगा और दूसरों को उनका पालन करना सिखाएगा, वही स्वर्ग के राज्य में महान कहलाएगा।‘ (मत्ती, 5, 17-20)
अब आप बताईये कि सेंट पॉल ने किस अधिकार से शरीअत मंसूख़ कर दी ? वे कहते हैं कि ‘यीशु ने अपने शरीर में बैर अर्थात व्यवस्था को उसकी आज्ञाओं तथा नियमों के साथ मिटा दिया। (इफिसियों, 2, 15)
यूहन्ना के चेलों ने जब मसीह से उनके साथियों के रोज़ा न रखने की वजह पूछी तो उन्होंने कहा कि ‘वे दिन आएंगे जब दूल्हा उनसे अलग कर किया जाएगा। उस समय वे उपवास करेंगे।‘ (मत्ती, 9, 15)
उन्होंने यह तो कहा कि वे अभी रोज़ा नहीं रख रहे हैं लेकिन कहा कि वे कुछ समय बाद रखेंगे। अस्ल बात यह थी कि मसीह धर्म प्रचार के लिए लगातार सफ़र करते रहे और मुसाफ़िर को इजाज़त होती है कि वह बाद में रोज़े रख ले।
उन्होंने हमेशा शरीअत की पाबंदी की बात की और कहीं भी उसे ख़त्म नहीं किया। सेंट पॉल ने शरीअत माफ़ कर दी ताकि रोमी और अन्य जातियां मसीह पर ईमान ला सकें। उन्होंने चाहे कितनी ही नेक नीयती से यह काम किया हो लेकिन उन्हें ऐसा करने का कोई अधिकार ही नहीं था।
मुसलमानों से सीखने की ज़रूरत है
आप देखते हैं कि हिंदुस्तान में कुछ लोग मुसलमानों द्वारा दी जाने वाली कुरबानी पर ऐतराज़ जताते हैं लेकिन मुसलमानों ने कभी उन्हें रिझाने की ग़र्ज़ से शरीअत को निरस्त घोषित नहीं किया। उनसे कहा जायेगा कि यह शरीअत ऐसी ही ठीक है आपका दिल चाहे कुबूल करके नजात पायें और आप इन्कार करना चाहें तो आपकी मर्ज़ी। पॉल को भी यही करना चाहिये था।
शरीअत कैंसिल करने के बाद फिर आप क्यों कहते हैं कि औरत चर्च में अपना सिर ढके ? यह हुक्म तो शरीअत का है और शरीअत को आप कैंसिल ठहरा चुके हैं।
जीवन को व्यवस्थित करने के लिए व्यवस्था ज़रूरी है
आदमी को जीने के लिये क़ानून दरकार है। उसे जायदाद का बंटवारा भी करना होता है और शादी-ब्याह और दूसरे सामाजिक मामले भी होते हैं। जब आपने शरीअत को कैंसिल कर दिया तो फिर आपने नेता चुने, उन्होंने आपके लिए क़ानून बनाये और आपने उन्हें माना। मैं पूछता हूं कि जब आपको क़ानून की ज़रूरत भी थी और आपको उसे मानना भी था तो फिर जो क़ानून खुदा ने मूसा को दिया था उसे मानते लेकिन आपने उसे छोड़ा और दुनिया के क़ानून को माना। आपने ऐसा क्यों किया ?
बाइबिल को एक से दो बना डाला
प्रोटैस्टेंट ने किस अधिकार से 7 किताबें जाली घोषित करके उन्हें बाइबिल से बाहर निकाल दिया ?
और फिर हर बीस साल बाद आप एक नया एडीशन ले आते हैं जिसमें हर बार पिछली बाइबिल के मुक़ाबले आयतें कम या ज़्यादा करते रहते हैं , ऐसा क्यों ?
आज चर्च की हालत यह हो रही है कि हम आये दिन अख़बारों में पढ़ते रहते हैं कि चर्च में समलैंगिक जोड़ों की शादियां कराई जा रही हैं। जबकि नबी हज़रत लूत अलैहिस्सलाम के ज़माने में समलैंगिकों पर खुदा का अज़ाब नाज़िल हुआ था।
पादरी साहब ने हामी भरी और मुकेश लॉरेंस भी पूरी दिलचस्पी से सुन रहे थे।
चर्च की धार्मिक रस्मों में शराब का प्रयोग क्यों ?
 मैंने कहा-‘आज चर्च में धार्मिक रस्म के तौर पर शराब पिलाई जा रही है। हज़रत मसीह पाक हैं और शराब नापाक। क्या कभी कोई नबी लोगों को शराब पिलाएगा ?
पादरी साहब बोले-‘नहीं‘
मैंने कहा-‘इंजील में हज़रत मसीह का एक चमत्कार लिखा है कि उन्होंने पानी को दाखरस बना दिया। मैंने कहा हो सकता कि दाखरस उस समय कोई शरबत वग़ैरह हो जिसे आज शराब समझ लिया गया हो ?
दाखरस ‘शराब‘ ही होता है
पादरी साहब बोले-‘लोग समझते हैं कि चर्च में वाइन पिलाई जाती है ऐसा नहीं है। दाखरस अंगूर का रस होता है। चर्च में वही रस पिलाया जाता है।
मैंने कहा-‘क्या उस रस में फ़र्मंटेशन होता है ?‘
उन्होंने कहा-‘हां‘
मैंने कहा-‘फ़र्मंटेशन के बाद रस से दो ही चीज़ें बनती हैं। एक एसीटिक एसिड यानि सिरका और दूसरे अल्कोहल यानि शराब। अब बताईये कि क्या वह रस सिरका होता है ?‘
पादरी साहब बोले-‘नहीं‘
मैंने कहा-‘तब वह दाखरस शराब ही होता है। किसी इबादतख़ाने में धर्म के नाम पर धार्मिक लोगों को शराब पिलाई जाये, इससे बड़ा अधर्म भला क्या होगा ?‘
पादरी साहब चुप रहे।
हज़रत मसीह ने जिसे हराम ठहराया उसे भी हलाल कैसे ठहरा लिया ?
मैंने कहा-‘यही हाल आपने खाने-पीने में हलाल-हराम का किया। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम एक बार बिना हाथ धोये खाना खाने लगे। यहूदियों ने ऐतराज़ किया कि आप बिना हाथ धोये खाते हैं ? तब उन्होंने जवाब दिया कि जो चीज़ बाहर से अन्दर जाती है वह नापाक नहीं करती बल्कि जो चीज़ अन्दर से बाहर आती है वह इनसान को नापाक करती है।‘
उनकी बात सही थी। हाथ की धूल इनसान की दिल को नापाक नहीं करती बल्कि दिल की नापाकी और गुनाह का बोल इनसान को नापाक कर देता है। इससे नसीहत यह मिलती है कि इनसान को गुनाह की बातें ज़बान से नहीं निकालनी चाहिये और अपने दिल को पाक रखना चाहिये। अगर सफ़र में कहीं बिना हाथ धोये खाना पड़ जाये तो दीन में इसकी इजाज़त है।
‘जो बाहर से अन्दर जाता है वह नापाक नहीं करता‘ इस उसूल को इतना एक्सपैंड क्यों कर लिया कि सुअर और हराम जानवर खाना भी जायज़ कर बैठे ? हराम-हलाल की जानकारी देने के लिए मसीह ने यह बात नहीं कही थी। हराम-हलाल जानना था तो शरीअत से मालूम करते, जिसकी पाबंदी मसीह ने जीवन भर की, उनकी मां ने की। क्या कभी मसीह अलैहिस्सलाम ने सुअर खाया ?
पादरी साहब बोले-‘नहीं‘
मैंने कहा-‘तब आप सुअर खाना कहां से जायज़ कर बैठे ?‘
वे चुप रहे।
हज़रत ईसा अ. की जान के दुश्मन यहूदियों की साज़िशें
मैंने कहा-‘हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम प्रतीकात्मक भाषा बोलते थे और दृष्टांत देते थे क्योंकि यहूदी हमेशा उनकी घात में रहते थे कि उनके मुंह से कोई बात पकड़ें और उन्हें क़ैसर का बाग़ी घोषित करके सज़ा दिलायें। यहूदियों ने धर्म को व्यापार बना दिया था। इबादतख़ानों को तिजारत की मंडी बनाकर रख दिया था। मसीह ने उनकी चैकियां इबादतख़ानों में ही उलट दी थीं और उन्हें धिक्कारा था। (मरकुस, 11, 15)
मसीह की मौजूदगी उनकी नक़ली दीनदारी की पोल खोल रही थी और उनके लिए अपनी चैधराहट क़ायम रखना मुश्किल हो रहा था। इसीलिए एक बार वे एक व्यभिचारिणी औरत को पकड़कर मसीह के पास लाये कि इसे क्या सज़ा दी जाये ? ताकि अगर मसीह शरीअत के मुताबिक़ सज़ा सुनाये तो वे उन्हें क़ैसर का बाग़ी घोषित करके उन्हें सज़ा दिलायें और अगर वे उसे माफ़ कर दें तो उन्हें नबियों की शरीअत मिटाने वाला कहकर पब्लिक में उन्हें मशहूर करें।
हज़रत मसीह अ. ने ऐसी बात कही कि यहूदियों की सारी साज़िश ही फ़ेल हो गई। उन्होंने कहा कि ‘तुम में जो निष्पाप हो, वही पुरूष सबसे पहिले इसको पत्थर मारे।‘ (यूहन्ना, 8, 8)
यह सुनकर किसी ने उस औरत को पत्थर न मारा। इस मौक़े पर भी मसीह अलैहिस्सलाम ने यहूदी चैधरियों और उनके पिछलग्गुओं को आईना दिखा दिया और ऐलानिया उन्हें गुनाहगार ठहरा दिया।
मसीह की हिकमत के सामने निरूत्तर हो गये साज़िश करने वाले
ऐसे ही एक बार उनसे साज़िशन पूछा गया कि क़ैसर को कर देना कैसा है ? ताकि अगर वे शरीअत के मुताबिक़ क़ैसर को कर देने से मना करें तो वे उन्हें क़ैसर का बाग़ी घोषित करके सैनिकों के हवाले कर सकें और अगर वे कर देने के लिये कहें तो वे उन्हें शरीअत के खि़लाफ़ अमल करने वाला ठहरा सकें।
इस बार भी इन दुष्टों को मुंह की खानी पड़ी। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने उनसे एक सिक्का लेकर पूछा कि ‘यह मूर्ति और नाम किसका है ?
उन्होंने कहा-‘कै़सर का।‘
तब हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम बोले कि‘ जो क़ैसर है वह क़ैसर को दो और जो खुदा का है वह खुदा को दो।‘ (मरकुस, 12, 16 व 17)
मसीह की तरह उनका कलाम भी बुलंद है उनके कलाम को उनके शिष्य ही नहीं समझ पाते थे
हज़रत मसीह का कलाम बहुत बुलंद है, इतना ज़्यादा बुलंद कि बहुत बार उनके साथ रहने वाले वे लोग भी उनके कहने की मुराद नहीं समझ पाते थे जिन्हें कि ख़ास तौर पह खुदा की तरफ़ से आसमानी बादशाहत के रहस्यों की समझ दी गयी थी, और एक वजह यह भी थी कि वे सभी आम समाज से आये थे।
‘उन बारहों को यीशु की एक भी बात समझ में नहीं आई। यीशु की बात का अर्थ उनसे छिपा रहा। जो कहा गया था, वह उनकी समझ में न आया।‘ (लूका, 18, 34)
हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम की बातों में छिपी चेतावनियों को यहूदी आलिम बखूबी समझते थे क्योंकि वे नबियों की किताबें पढ़ने की वजह से नबियों के अन्दाज़े-कलाम से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे लेकिन मसीह के प्रेरितों की समझ उस दर्जे की न थी। यही वजह है कि प्रेरितों को अक्सर मसीह से पूछना पड़ा कि हे गुरू आपके कहने का तात्पर्य क्या है ?
जब मसीह ने खुदा के कलाम को बीज की मिसाल देकर समझाया तब भी प्रेरितों को उनसे पूछना पड़ा कि वे कहना क्या चाहते हैं ? (मरकुस, 4, 10-12)
परमेश्वर को ‘पिता‘ कहने का वास्तविक अर्थ
मसीह ने खुदा को पिता कहकर पुकारा क्योंकि इस्राइली जाति में आने वाले नबी खुदा को अलंकारिक रूप से बाप कहकर संबोधित करते आये थे। उन्हीं नबियों की तरह मसीह ने भी खुदा को पिता कहा लेकिन लोगों ने अलंकार को यथार्थ समझ लिया और मसीह को खुदा को ऐसा ही बेटा ठहरा दिया जैसा कि आम इनसानों में बाप-बेटे का रिश्ता होता है। मसीह ने खुद को आदम का बेटा भी कहा है। यहां वे यथार्थ ही कह रहे हैं। मसीह को इंजील में पवित्रात्मा का बेटा, दाऊद का बेटा और यूसुफ़ बढ़ई का बेटा भी कहा गया है। यूसुफ़ को उनकी परवरिश करने की वजह से उनका बाप कहा गया है, दाऊद के वंश से होने के कारण दाऊद को उनका बाप कहा गया और पवित्रात्मा ने मसीह को अपना पु़त्र उनकी रूहानी खूबियों की वजह से कहा।
पवित्र इंजील में पांच लोगों के साथ उनके बाप-बेटे के रिश्ते का ज़िक्र आया है। हमें हरेक जगह उसकी सही मुराद को समझना पड़ेगा, अगर हम सत्य को पाना चाहते हैं तो, वर्ना अगर हम हरेक जगह बाप शब्द का एक ही अर्थ समझते गये तो फिर हम सच नहीं जान पाएंगे।
परमेश्वर के लिए पिता शब्द कहना अलंकार मात्र है, उसे लिटेरल सेंस में लेना ऐसी ग़लती है जिसकी वजह से ईसा मसीह को पहले खुदा का बेटा मान लिया गया और फिर उन्हें खुदा ही मान लिया गया। उन्हीं से दुआएं मांगी जाने लगीं जबकि वे खुद ज़िन्दगी भर खुदा से दुआएं मांगते रहे और अपनी दुआओं के पूरा होने पर खुदा का शुक्र बुलंद आवाज़ में अदा करते रहे ताकि कोई उनके ज़रिये से होने वाले चमत्कार देखकर कन्फ़्यूज़ न हो जाये और उन्हें खुदा न समझ बैठे।
मुर्दे को ज़िन्दा करने वाला खुदा है, मसीह अ. तो खुदा से ज़िन्दगी के लिए दुआ किया करते थे
उन्होंने लाजरस को आवाज़ दी और लाजरस अपनी क़ब्र से बाहर निकल आया, ज़िन्दा होकर तब भी मसीह ने खुदा का शुक्र अदा किया और कहा कि तू सदा मेरी प्रार्थना सुनता है। (यूहन्ना, 11, 42)
इसका मतलब लाजरस को ज़िन्दा करने के लिए मसीह ने खुदा से दुआ की थी और खुदा ने उनकी दुआ कुबूल कर ली थी। लाजरस का ज़िन्दा होना खुदा के हुक्म से था।
यहां से यह भी पता चलता है कि मसीह की दुआ हमेशा सुनी गई। इसलिये यह नामुमकिन है कि मसीह की आखि़री रात की दुआ न सुनी गई हो। जब मसीह तन्हाई में जाकर घुटने टेककर खुदा से दुआ करते हैं कि ‘हे पिता यदि तू चाहे तो इस कटोरे को मेरे पास से हटा ले। तो भी मेरी नहीं परन्तु तेरी ही इच्छा पूर्ण हो ?‘ (लूका, 22, 42)
खुदा ने हज़रत ईसा अ. की हर दुआ कुबूल की
मसीह ने ऐसा मौत के डर से नहीं कहा बल्कि उन्हें मालूम था कि उनके इन्कार के बदले में इन्कारी अज़ाब का शिकार होंगे और उन्हें मसीह मानने वाले अभी कच्चे हैं, उन्हें कुछ समय और चाहिये। मसीह की कोई दुआ कभी रद्द नहीं हुई, यह दुआ भी रद्द नहीं हुई लिहाज़ा मौत का कटोरा खुदा ने उनके सामने से हटा लिया और उन्हें जीवित ही आसमान पर उठा लिया। उन्हें सलीब पर चढ़ाया तो ज़रूर गया लेकिन सलीब पर उन्हें मौत नहीं आई। वे सलीब पर बेहोश हो गए। दूर से देखने वालों ने समझा कि वे मर गए। यह लोगों की सोच थी न कि हक़ीक़त। (लूका, 23, 49)
जो कहे कि मार्ग, जीवन और सच्चाई मैं ही हूं। (यूहन्ना, 14, 6) जो साक्षात जीवन हो उसे मौत आ भी कैसे सकती थी ? जबकि उसने खुदा से मौत का कटोरा अपने सामने से हटाने की दुआ भी की हो (मरकुस, 14, 36) और उसकी दुआ मालिक ने कभी रद्द न की हो। (यूहन्ना, 11, 42)
हज़रत ईसा अ. को मौत नहीं आई, वे ज़िन्दा हैं
मसीह को जब सलीब से उतारा गया तो वे बेहोश थे न कि मुर्दा। उन्हें यूसुफ़ अरमतियाह ने गुफ़ानुमा एक क़ब्र में रखा। उनके बदन पर मारपीट की चोटों के भी ज़ख्म थे और उस भाले का भी जो सिपाहियों ने चलते-चलते उन्हें मारा था और खून और पानी उनके बदन से निकला था (यूहन्ना, 19, 34) जोकि खुद उनकी ज़िन्दगी का सुबूत है।
तीसरे दिन मरियम मगदलीनी उनकी क़ब्र पर पहुंची लेकिन उनकी क़ब्र ख़ाली थी। हज़रत ईसा ने उसे संबोधित किया-‘हे नारी ! तू क्यों रो रही है ? तू किसे ढूंढ रही है ? (यूहन्ना, 20, 15) तो वह उन्हें पहचान नहीं पाई, वह उन्हें माली समझी। तब ईसा अलैहिस्सलाम ने खुद को उस पर ज़ाहिर किया तब वह उन्हें पहचान पाई। उन्होंने उसे खुद को छूने से रोक दिया क्योंकि वे ज़ख्मी थे। यहां यह भी क़ाबिले ग़ौर है कि उन्होंने मरियम से कहा कि मुझे मत छू ; क्योंकि मैं अब तक पिता के पास ऊपर नहीं गया हूं। (यूहन्ना, 20, 17)
और सलीब पर अपने साथ टंगे हुए एक डाकू से कहा था कि ‘मैं तुझसे सच कहता हूं, आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा । (लूका, 23, 43)
ख़ैर खुदा ने मसीह की दुआ सुन ली और उन्हें आसमान पर उठा लिया जहां से वे दोबारा तब आयेंगे जब कि खुदा उन्हें भेजना चाहेगा।
पादरी साहब और लॉरेंस मेरी बात को दिलचस्पी और ग़ौर से सुन रहे थे।
खुदा ने मसीह अ. को सलीब पर मरने के लिए भेजा ही नहीं था
खुदा ने मसीह को सलीब पर मरने के लिए नहीं भेजा था और न ही खुद मसीह की मर्ज़ी थी कि वे सलीब पर मरें। इसीलिए उन्होंने खुदा से ‘दुख के कटोरे‘ को हटाने की दुआ की। वे सलीब पर मरें, ऐसा तो यहूदी चाहते थे। उन्हें डर था कि अगर उन पर ईमान लाने वालों की तादाद इसी तरह बढ़ती रही तो रोमी उन्हें बाग़ी समझेंगे और उनकी जगह और जाति पर क़ब्ज़ा कर लेंगे। इसलिए वे कहते थे कि ‘हमारी भलाई इस बात में है कि हमारी जाति के लिए एक मनुष्य एक मरे और सारी जाति नष्ट न हो।‘ (यूहन्ना, 11, 50)
साज़िश में कही गयी मसीह के दुश्मनों की बात उनपर ईमान लाने वालों का अक़ीदा कैसे बन गई ?
आपने कैसे मान लिया कि लोगों को पैदाइशी गुनाह से मुक्ति दिलाने के लिए मसीह एक बेऐब मेमने की मानिन्द सलीब पर कुर्बान हो गए ?
ईसा अ. बच्चों को मासूम और स्वर्ग का हक़दार मानते थे न कि जन्मजात पापी
मसीह ने कभी बच्चों को पैदाइशी गुनाहगार नहीं माना। एक बार लोग अपने बच्चों को उनके पास लाये ताकि वे उनपर अपना हाथ रखें और बरकत की दुआ दें। पर चेलों ने उनको डांटा। यह देखकर मसीह ने नाराज़ होकर उनसे कहा कि ‘बच्चों को मेरे पास आने दो और उन्हें मना न करो; क्योंकि परमेश्वर का राज्य ऐसों का ही है। मैं तुमसे सच कहता हूं कि जो कोई परमेश्वर के राज्य को छोटे बच्चे के समान ग्रहण न करे, वह उस में कभी प्रवेश करने न पाएगा।‘
यीशु ने उन्हें गोद में लिया, और उन पर हाथ रखकर उन्हें आशीष दी। (मरकुस, 10, 14-16)
मसीह ने तो अपने साथियों से कहा कि वे खुद को बच्चों की मानिन्द बनायें हालांकि वे महीनों से उनके साथ थे और उन्होंने मसीह के ज़रिये होने वाले चमत्कार भी देखे थे और उन्हें ‘ईमान का निजी अनुभव‘ भी था। उन्होंने बच्चों से नहीं कहा कि वे उनके साथियों की मानिन्द बनें। अगर बच्चे पैदाइशी गुनाहगार होते तो वे अपने साथियों को उनकी मानिन्द बनने की नसीहत हरगिज़ न करते।
परमेश्वर का मेमना बचा लिया गया
दूसरी बात मेमने की कुरबान होने के बारे में है। ओल्ड टेस्टामेंट में है कि मेमना बचा लिया गया। मेमना प्रतीक है मसीह का। जब मेमने के बारे में आया है कि उसे बचा लिया गया तो इसका मतलब यही है कि मसीह को बचा लिया गया। धर्मशास्त्र में भी आया है कि ‘मैं दया से प्रसन्न से होता हूं बलिदान से नहीं।‘ (मत्ती, 12, 7)
न तो कोई बच्चा पैदाइशी गुनाहगार होता है और न ही मसीह सलीब पर लोगों के पापों के प्रायश्चित के तौर पर कुरबान होने के लिए भेजे गए थे और न ही वे सलीब पर मरना चाहते थे और न ही वे सलीब पर मरे।
मसीह का मिशन क्या था ?
मसीह का मिशन था लोगों को शैतान की गुलामी और गुनाहों की दलदल से निकालना। इसके लिए वे चाहते थे कि लोग दीनदारी का दिखावा न करें बल्कि सचमुच दीनदार बनें। इसीलिए उन्होंने कहा कि ‘हे पाखंडी शास्त्रियों और फ़रीसियों , तुम पर हाय ! तुम पोदीने, सौंफ़ और ज़ीरे जैसी छोटी-छोटी वस्तुओं का दसवां अंश देते हो। परन्तु तुम ने धर्म-व्यवस्था की गम्भीर बातों को अर्थात न्याय, दया और विश्वास को छोड़ दिया है। तुम्हें चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते और उन्हें भी न छोड़ते। हे अन्धे अगुवों, तुम मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊंट को निगल जाते हो। (मत्ती, 23, 23 व 24)
यहां पर भी मसीह ने शरीअत को कैंसिल नहीं किया बल्कि लोगों को डांटा कि वे शरीअत के अहम हुक्मों पर अमल नहीं कर रहे हैं।
मसीह का मिशन था ‘सत्य पर गवाही देना‘
वे कहते हैं कि ‘मैंने इसीलिए जन्म लिया और इसीलिए संसार में आया हूं कि सत्य पर गवाही दूं।‘ (यूहन्ना, 18, 37)
उन्होंने कहा कि ‘हे सब परिश्रम करने वालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ। मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो और मुझसे सीखो। (मत्ती, 11, 28 व 29)
मसीह का जूआ लादने के लिए ज़रूरी था कि जो जूआ उन पर पहले से लदा है वे उसे उतार फेंके, लेकिन जो फ़रीसी वग़ैरह इन ग़रीब लोगों पर अपना जूआ लादे हुए थे वे कब चाहते थे कि लोग उनके नीचे से निकल भागें।
‘तब फ़रीसियों ने बाहर जाकर यीशु के विरोध में सम्मति की, कि यीशु का वध किस प्रकार करें। (मत्ती, 12, 14)
नक़ली खुदाओं की दुकानदारी का ख़ात्मा था मसीह का मिशन
नबी के आने से नक़ली खुदाओं की खुदाई का और उनके जुल्म का ख़ात्मा होना शुरू हो जाता है, इसलिये इनसानियत के दुश्मन हमेशा नबी का विरोध करते हैं और आम लोगों को भरमाते हैं।
तब नबी का उसके देश में निरादर किया जाता है, उसे उसके देश से निकाल दिया जाता है और यरूशलम का इतिहास है कि वहां के लोगों ने बहुत से नबियों को क़त्ल तक कर डाला।
मसीह के साथ किया गया शर्मनाक बर्ताव और उन्हें क़त्ल करने की नाकाम कोशिश भी उसी परम्परा का हिस्सा थी।
मसीह का मिशन, खुदा का मिशन था और खुदा के कामों को रोकना किसी के बस में है नहीं
आखि़रकार जब मसीह के काम में रूकावट डाली गई और उन्हें ज़ख्मी कर दिया गया तो उन्हें कुछ वक्त के लिए आराम की ज़रूरत पड़ी। मालिक ने उन्हें दुनिया से उठा लिया, सशरीर और ज़िन्दा। लेकिन उनके उठा लिए जाने से खुदा का मिशन तो रूकने वाला नहीं था। सो मसीह ने दुनिया से जाने से पहले कहा था कि ‘मैं तुमसे सच कहता हूं कि मेरा जाना तुम्हारे लिए अच्छा है। जब तक मैं नहीं जाऊंगा तब तक वह सहायक तुम्हारे पास नहीं आएगा। परन्तु यदि मैं जाऊंगा तो मैं उसे तुम्हारे पास भेज दूंगा। जब वह आएगा तब संसार को पाप, धार्मिकता और न्याय के विषय में निरूत्तर करेगा।‘ (यूहन्ना, 16, 6-8)
‘मुझे तुमसे और भी बहुत सी बातें कहनी हैं। परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा तब तुम्हें सम्पूर्ण सत्य का मार्ग बताएगा। वह मेरी महिमा करेगा , क्योंकि जो मेरी बातें हैं, वह उन्हें तुम्हें बताएगा।
                                                                       (यूहन्ना, 16, 12-14)
हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की भविष्यवाणी पूरी हुई और दुनिया में हज़रत मुहम्मद स. तशरीफ़ लाए। उन्होंने गवाही दी कि ईसा कुंवारी मां के बेटे थे और मसीह थे। खुदा के सच्चे नबी थे, मासूम थे। वे ज़िन्दा आसमान पर उठा लिए गए और दोबारा ज़मीन पर आएंगे और मानव जाति के दुश्मन ‘दज्जाल‘ (एंटी क्राइस्ट) का अंत करेंगे।
हज़रत मुहम्मद स. ने खुदा के हुक्म से हज़रत ईसा अ. के काम को ही अंजाम तक पहुंचाया है
जो बातें मसीह कहना चाहते थे लेकिन कह नहीं पाए, वे सब बातें पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. ने दुनिया को बताईं और उन्होंने संसार को पाप, धार्मिकता और न्याय के विषय में निरूत्तर किया।
आज ज़मीन पर 153 करोड़ से ज़्यादा मुसलमान आबाद हैं। हरेक मुसलमान सिर्फ़ उनकी गवाही की वजह से ही ईसा को खुदा का नबी और मसीह मानते हैं। मरियम को पाक और उनकी पैदाइश को खुदा का करिश्मा मानते हैं। क्या मसीह के बाद दुनिया में हज़रत मुहम्मद स. के अलावा कोई और पैदा हुआ है जिसने मसीह की सच्चाई के हक़ में इतनी बड़ी गवाही दी हो और खुदा की शरीअत को ज़मीन पर क़ायम किया हो ?
‘सत्य का आत्मा‘ हैं हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
अगर आप इसके बावजूद भी हज़रत मुहम्मद स. को ‘सत्य का आत्मा‘ नहीं मानते तो फिर आप बताएं कि ‘सत्य का आत्मा‘ कौन है, जिसे मसीह ने जाकर भेजने के लिए कहा था ?
उनके अलावा आप किसे कह सकते हैं कि उसने सम्पूर्ण सत्य का मार्ग बताया है ?
क्या एक ईसाई के लिए इंजील के खि़लाफ़ अमल करना जायज़ है ?
ख़ैर , हो सकता है कि हज़रत मुहम्मद स. की सच्चाई पर मुतमईन होने में आपको कुछ वक्त लगे लेकिन जिस इंजील पर आप ईमान रखते हैं, उसके खि़लाफ़ अमल करने का आपको क्या हक़ है ?
इंजील के खि़लाफ़ न तो मैं अमल करना चाहता हूं और न ही आपको करने दूंगा।
बहुत बार ऐसा होता है कि जो बात ज्ञानियों से पोशीदा रह जाती हैं, उन्हें मालिक बच्चों पर खोल देता है। (मत्ती, 11, 25)
ज्ञानी में ज्ञान का अहंकार भी आ जाता है और उसे लगता है कि सभी ज़रूरी बातें जो जान लेनी चाहिए थीं उन्हें वह जान चुका है। ज्ञान के उसकी प्यास ख़त्म हो जाती है। प्यास ख़त्म तो समझो तलाश भी ख़त्म और नियम यह है कि ‘जो ढूंढता है वह पाता है।‘
जो ढूंढता है वह पाता है
बच्चे स्वाभाविक रूप से ही जिज्ञासु होते हैं और पक्षपात उनमें कुछ होता नहीं। सत्य को जानने के लिए यही दो आवश्यक शर्तें हैं, जो बच्चे पूरी कर देते हैं और ज्ञानी पूरी कर नहीं पाते। बच्चे ढूंढते और वे पा लेते हैं क्योंकि वे पाने की शर्तों पर खरे उतरते हैं।
मैं भी एक बच्चा ही हूं। मुझे कुछ मिला है। आप इसे देख लीजिये। आपको जंचे तो ठीक है वर्ना क़ियामत के रोज़ मसीह खुद बता देंगे कि उनके किस क़ौल का क्या मतलब था ?
तब बहुत से लोग उनके पास आएंगे और उनसे कहेंगे कि हमने तेरे साथ खाया-पीया था और तूने हमारे बाज़ारों में उपदेश दिया था।, लेकिन मसीह उन्हें धिक्कार कर कहेंगे कि हे कुकर्म करने वालो, तुम सब मुझसे दूर रहो। (लूका, 13, 27)
जीवन की सफलता के लिए ‘सत्कर्म‘ ज़रूरी है
इसीलिए मैं कहता हूं कि बिना सत्कर्म के सिर्फ़ मौज्ज़े और चमत्कार किसी की सच्चाई को परखने का सही पैमाना नहीं है। सत्कर्म का पैमाना केवल ‘व्यवस्था‘ है। यही मसीह की शिक्षा है। चमत्कार तो मसीह ने भी दिखाए और एंटी-क्राइस्ट भी दिखाएगा, लेकिन दोनों में फ़र्क़ यह होगा कि मसीह आये थे जो जो शरीअत को क़ायम करने और मसीह आएगा शरीअत को मिटाने के लिए। सही-ग़लत की पहचान का सही पैमाना शरीअत है, इसमें किसी को कभी धोखा नहीं हो सकता।
खुदा का हुक्म और मसीह की मर्ज़ी दो नहीं, बल्कि एक है
‘मसीह में जीने‘ और ‘खुदा में जीने‘ का मतलब भी यही है कि खुदा की मर्ज़ी और मसीह के तरीक़े में जीना। खुदा की मर्ज़ी और मसीह का तरीक़ा दो नहीं हैं बल्कि ‘एक‘ है। इसीलिए मसीह कहते हैं कि ‘मैं और पिता एक है।‘
खुदा की मर्ज़ी ही मसीह का तरीक़ा है और मसीह के तरीक़े का नाम ही शरीअत है। लोगों की आसानी के लिए शरीअत की तकमील ही मसीह के आने और जाने का मक़सद थी। अब मसीह जिस्मानी ऐतबार से हमारे दरम्यान नहीं हैं लेकिन उनका तरीक़ा हमारे सामने आज भी है। अगर आप मसीह में जीना चाहते हैं तो आपको उनके तरीक़े में जीना होगा। जिस तरह उन्होंने दिन गुज़ारा उस तरह आपको दिन गुज़ारना होगा और जिस तरह उन्होंने रात गुज़ारी उस तरह आपको रात गुज़ारनी होगी। जिस खुदा की उन्होंने इबादत की उसी खुदा की इबादत आपको करनी होगी और जिस खुदा से घुटने टेककर वे दुआ मांगा करते थे उसी खुदा से आपको दुआ मांगनी होगी। तब जाकर आप मसीह के तरीक़े को पा सकेंगे और मसीह में जी सकेंगे।
मसीह ने ज़िन्दगी भर केवल एक ईश्वर की उपासना की है, न तीन की और न ही दो की
यह नहीं कि मसीह तो ज़िन्दगी भर अपने पैदा करने वाले खुदा की इबादत करते रहे, उसी से दुआ मांगते रहे और दुआ पूरी होने पर उसी का शुक्र अदा करते रहे और सभी इस बात के गवाह भी हैं, लेकिन अब आप उनके तरीक़े के खि़लाफ़ खुदा को छोड़कर मसीह की इबादत करने लगें और उन्हीं से दुआएं मांगने लगें और शुक्र भी उन्हीं का अदा करने लगें और कोई पूछे तो आप कह दें कि मसीह ने कहा है कि ‘मैं और पिता एक हैं।‘
 भाई ! उनका कहना बिल्कुल सही है लेकिन उनके कहने को उनके करने के साथ जोड़कर तो देखिए।
जब उन्होंने कहा कि मैं और पिता एक हैं, तो क्या वे खुद अपनी इबादत करने लगे थे या मुसीबतों में खुद से ही दुआएं किया करते थे ?
अब उनके शिष्यों को देखिए कि उनके शिष्यों ने उनके मुंह से यह सुनकर क्या किया ?
क्या उनमें से किसी ने कभी खुदा के अलावा किसी की इबादत की ?
या उन्होंने मसीह से कभी घुटने टेककर दुआएं मांगी ?
हालांकि उन्होंने मसीह से सुना कि ‘जो कुछ पिता का है वह सब मेरा है‘ और ‘स्वर्ग और धरती का अधिकार मुझे दे दिया गया।‘ इसके बावजूद भी जब कभी किसी ने मसीह को उत्तम कहा तो उन्होंने यही कहा कि ‘तू मुझे उत्तम क्यों कहता है ? कोई उत्तम नहीं, केवल एक अर्थात परमेश्वर।‘ (मरकुस, 10, 18)
‘तू अपने प्रभु परमेश्वर को प्रणाम कर और केवल उसी की उपासना कर। (लूका, 4, 8)
आखि़री विनती
पादरी राकेश चार्ली साहब और भाई मकेश लॉरैंस साहब से और भी काफ़ी बातें हुईं जिन्हें किसी और वक्त पेश किया जाएगा। मैं नहीं जानता कि इन बातों को उन्होंने कितना माना ? और कितना उन पर विचार किया ?
यही बातें अब मैं आपके सामने रखता हूं। आपको जो बात सही लगे उसे ले लीजिए और जो बात ग़लत लगे मुझे उसके बारे में बता दीजिए ताकि मैं उसे सही कर लूं। मैं आपका शुक्रगुज़ार रहूंगा। 
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Tuesday, May 18, 2010

Fatwa क्या होता है फ़तवा, पहले यह जानो तो........


जावेद अख़्तर साहब एक प्रगतिशील शायर हैं और अब तो संसद सदस्य भी हैं। इसलिए वह किसी भी प्रश्न के जवाब में कुछ भी कह सकते हैं। पिछले दिनों जब वंदे मातृम पर बहस चल रही थी तो आपने फरमाया था कि मैं ही क्या मेरा पूरा परिवार वंदे मातृम गाता है, और अब उन्होंने दारुलउलूम देवबंद के मुफ़्ती साहेबान जनाब मुफ़्ती हबीबुर्रेहमान साहब, जनाब मुफ़्ती फ़ख़रुल इस्लाम साहब, जनाब मुफ़्ती वक़ार अली साहब और जनाब मुफ़्ती मेहमूद हसन बुलंद शहरी साहब द्वारा दिए गए फ़तवे पर अपनी टिप्पणी कर दी, जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं। अब ज़ाहिर है कि जावेद अख़्तर जैसे बड़े आदमी को जान से मारने की धमियां मिलें और उन पर ध्यान न दिया जाए, उनकी सुरक्षा की उचित व्यवस्था न की जाए, यह तो संभव ही नहीं है। अब इस पर आप विचार विमर्श करते रहिए कि जावेद अख़्तर साहब की इस टिप्पणी का भारतीय समाज विशेष कर मुसलमानों पर क्या प्रभाव होगा, या उनको जान से मारने की धमकियों को किस रूप में लिया जाएगा?



लेकिन यह उनकी समस्या नहीं है, जिनकी समस्या है वह इस पर विचार करें। बहरहाल इस विषय पर उठे विवाद के कारण हम चाहते हुए भी इसकी अनदेखी नहीं कर सके। हालांकि आज जब देवबंद के आलिमे दीन मोहतरम नूरुलहुदा साहब ने फोन पर अपनी विपदा सुनाई तो मन में यही था कि आज का लेख इसी विषय पर होगा कि क्यों दिल्ली से लंदन के लिए अमारात एयरलाइंस की फ़्लाइट के उड़ान भरने से पूर्व केवल एक ज़रासी बात पर न केवल उन्हें जहाज़ से उतार दिया गया बल्कि उनके मान सम्मान का ध्यान रखे बिना उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया गया। उनका दोष केवल इतना सा था कि उन्होंने अपने बेटे से फोन पर कहा था कि 15-20 मिनट में जहाज़ उड़ जाएगा। बेचारे मौलाना अगर अंग्रेज़ी में यह कह देते कि 15-20 मिनट में प्लेन टेकऑफ करेगा तो उन्हें इतनी पीड़ा और बदनामी का सामना न करना पड़ता। बहरहाल इस विषय पर बातचीत कल होगी। आज मैं केवल कुछ वाक्य दारुलउलूम देवबंद के मुफ़्ती मोहतरम मुफ़्ती साहेबान जनाब मुफ़्ती हबीबुर्रेहमान साहब, जनाब मुफ़्ती फ़ख़रुल इस्लाम साहब, जनाब मुफ़्ती वक़ार अली साहब और जनाब मुफ़्ती मेहमूद हसन बुलंद शहरी साहब द्वारा दिए गए फ़तवे पर लिखना चाहता हूं। सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि फ़तवा क्या होता है और किन परिस्थितियों में दिया जाता है। फ़तवा उस धार्मिक मार्गदर्शन का नाम है, जो किसी भी प्रश्न करने वाले के जवाब में मुफ़्ती हज़रात क़ुरआन और हदीस की रोशनी में देते हैं। इसमें किसी के स्वार्थ तथा इच्छा का दख़ल बिल्कुल नहीं होता। फ़तवा देने वाले मुफ़्ती की स्थिति वही होता है जो आम अदालतों में एक वकील की होती है जो केवल क़ानून की रोशनी में बातचीत करते हैं उसमें संशोधन करने का उन्हें कोई अधिकारनहीं होता और उसके लिए उन्हें भारत सरकार के स्वीकृत संस्थानों से बाक़ाएदा डिग्री लेनी होती है। फ़तवा देने का अधिकार भी उन्हीं आलिमों को होता है, जो बाजाब्ता इसका कोर्स करते हैं और फिर दारुलइफ़ता में मौजूद बड़े उलमा-ए-दीन और मुफ़्ती साहेबान से प्रशिक्षण प्राप्त करके धार्मिक मसले बताते हैं। स्पष्ट हो कि कोई भी आलिमे दीन केवल मसअला बता सकता है, वह फ़तवा देने का अधिकृत नहीं है। फतवा केवली मुफ़्ती ही दे सकते हैं जिन्होंने बाक़ाएदा डिग्री प्राप्त की है, अब हम अगर भारत के परिपेक्ष में बात करें तो किसी भी मुफ़्ती द्वारा दिए गए फ़तवे को लागू कराने की अदालतें या सरकार पाबंद नहीं है और यह फैसला भी सवाल पूछने वाले के विवेक पर है कि उसके सवाल के जवाब में मुफ़्ती द्वारा दिए गए फ़तवे पर वह किस हद तक अमल करता है, लेकिन यदि सवाल करने वाला एक आम मुसलमान या हमारा समाज यह आशा करे कि सवाल के जवाब में जारी किया गया फ़तवा सबको स्वीकारीय हो, सबकी पसंद के पैमाने पर पूरा उतरता हो तो यह संभव नहीं है। हमें यह भी समझना चाहिए कि किसी भी सवाल के जवाब में एक योग्य मुफ़्ती का जारी किया गया फ़तवा इस सवाल के जवाब में एक आइडियल स्थिति को स्पष्ट करता है। इसे हम यूं समझें कि कुरआन-ए-करीम एक संविधान है, जीवन व्यवस्था को समझने और सीरत-ए-रसूल सल्ल॰ (रसूल का क़ौल और अमल) इस आसमानी किताब की रोशन में उसका व्यवहारिक नमूना पेश करती है। अब चूंकि किसी भी मुफ़्ती की ओर से जारी किया गया फ़तवा क़ुरआन और हदीस की रोशनी में होता है, इसलिए वह इस्लाम पर अमल करने की एक ऐसी उच्च स्थिति होती है, जो इस्लाम के पैग़म्बरों द्वारा बताई गई और उनके अमल की रोशनी में सारी दुनिया तक पहुंचाई गई है। ज़ाहिर है कि किसी भी आम मुसलमान के लिए यह संभव नहीं है कि जीवन के हर मामले में ठीक कुरआन और हदीस की रोशनी में पूर्णतः अमल करे, लेकिन जिस हद तक भी वह इस पर अमल कर सके वही बेहतर से बेहतर सूरतेहाल हो सकती है। लेकिन अगर मुफ़्तियाने किराम से यह उम्मीद करें कि वह आइडियल पोज़ीशन से हट कर कोई आसान सी सूरत हमारे सामने रख दें तो उनसे यह अपेक्षा करना ग़लत होगा। अब अगर बात करें, इस समय उठाए गए उन प्रश्नों पर जो अपने वर्तमान फ़तवे में देवबंद के मुफ़्ती साहेबान द्वारा सामने रखे गए हैं तो समाज को यह अधिकार है कि वह इस फ़तवा को जिस तरह चाहे देखें, परन्तु टिप्पणी करने से पहले उस पर विचार अवश्य करें कि यह किस हद तक आलोचना के योग्य है। जहां तक महिलाओं का पुरुषों के साथ काम करने का संबंध है तो पूर्व इसके कि मैं इस पर वर्तमान फ़तवे की रोशनी में बातचीत करूं, एक शोध पेपर के मुख्य अंश पाठकों की सेवा में पेश करना चाहता हूं। हमारे प्रगतिशील और विद्वान मित्रगण निम्नलिखित लिंक http:/www.patrika.com/news.aspx?id=250618पर जाकर अपनी जानकारियों में वृद्धि कर सकते हैं रिसर्च पेपर का विवरण कुछ इस प्रकार है: देश के राष्ट्रपति तथा लोकसभा स्पीकर जैसे बड़े पद भले ही महिलाओं के पास हों लेकिन एक ताज़ा रिसर्च के परिणामों पर भरोसा करें तो आज भी समाज में मर्दों की वर्चस्व वाली मानसिकता देखने को मिलती है। इस रिसर्च में पाया गया है कि आज़ादी के 62 वर्ष बाद तक शिक्षित वर्ग भी महिलाओं को यह एहसास दिलाने से नहीं चूकता कि वह एक महिला है। यही कारण है कि सरकारी तथा निजी नौकरियों में उच्च पदों पर नौकरी प्राप्त कर लेने के बावजूद महिलाओं के लिए उनकी नौकरी किसी युद्ध के मोर्चे पर नियुक्त होने से कम नहीं है। एक ऐसा युद्ध जहां परेशानियां कार्यालय से लेकर घर तक उनका पीछा नहीं छोड़तीं और वह मानसिकरूप से इस हद तक परेशानियों का शिकार हो जाती है कि आप उन्हें मानसिक रोगी समझ सकते हैं।यह रिसर्च गुजरात यूनिवर्सिटी के ह्यूमन साइकॉलॉजी डिपार्टमेंट के एम॰ए॰ साइकॉलॉजी के छात्र के एक वर्ष के अध्ययन के बीच सामने आए परिणामों पर आधारित है। इस बारे में जानकारी उपलब्ध कराते हुए डा॰ जॉन सारी ने बताया कि रिसर्च के दौरान बैंक में काम करने वाली महिलाएं, टीचर, नर्स और विभिन्न सरकारी विभागों में टाइपिस्ट के रूप में काम करने वाली 21 से 56 वर्ष तक की महिलाओं के अनुभवों को सामने रखा गया है। 306 नौकरी पेशा महिलाओं से लिखित रूप में उनकी राय मांगी गई। उनमें से 215 विवाहित थीं और 81 अविवाहित। इनमें वह भी थीं जिनकी शिक्षा मात्र दसवीं कक्षा पास तक थी और उनमें वह भी शामिल थीं जिन्होंने एम॰फिल (M.Phil) या पीएचडी (PHD) तक शिक्षा प्रापत की थी। फिर महिलाओं को आयु के हिसाब से दो श्रेणियों में रखा गया, जिनमेंसे एक में 21 से 30 वर्ष आयु की महिलाएं और दूसरी में 31 से 56 वर्ष तक की महिलाओं को शामिल किया गया। व्यवसाय से जुड़ी महिलाओं की कठिनाइयां और उनके समाधान जैसे विषय पर मांगे गए लिखित विचारों की रोशनी में इस रिसर्च के परिणाम से मालूम होता है कि 66 प्रतिशत महिलाएं अपने वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा शोषण का शिकार होती हैं, जिसमें से 21 से 30 वर्ष आयु श्रेणी की 188 महिलाओं में से 80 प्रतिशत ने कहा कि उनके अधिकारी उनके महिला होने का लाभ उठाते हैं और उन्हें परेशान करते हैं।31 से 34 वर्ष आयु के बीच की महिलाओं में से 45 प्रतिशत का कहना है कि उन्हें शारीरिक शोषण तथा छेड़छाड़ का सामना करना पड़ता है। 39 प्रतिशत महिलाओं का कहना था कि नौकरी लगने के बाद भी वह चाहते हुए भी आगे नहीं पढ़ पातीं। उनकी शिकायतों पर उचित कार्यवाही न होने के चलते उन्हें लगातार शोषण सहन करना पड़ता है।निजी कम्पनियों में कार्यरत 21 से 30 वर्ष आयु की 43 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि वह महिला हैं इसलिए उन्हें अपेक्षाकृत कम वेतन मिलता है, जबकि उनका पद और कार्य सहकर्मी मर्दों के बराबर होता है। 31 से 56 वर्ष आयु की 27 प्रतिशत महिलाओं ने भी यही शिकायत दोहराई। 21 से 30 वर्ष तक की 48 प्रतिशत महिलाओं का कहना था कि उन्हें समय पर तरक्की तथा प्रोत्साहन नहीं मिलता। सबसे चिंता की बात यह है कि 51 प्रतिशत नौकरी पेशा महिलाएं मानसिक रोगों का शिकार पाई गईं। घर तथा कार्यालय में उचित सहयोग न मिलने के चलते नौकरी करने वाली 51 प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी मानसिक रोग का शिकार पाई गईं। अगर इसकी और समीक्षा करें तो 21 से 30 वर्ष आयु तक की नौकरी पेशा महिलाओं में 63 प्रतिशत मानसिक रोगी थीं। जबकि 31 से 56 वर्ष आयु तक की महिलाओं में 40 प्रतिशत मानसिक रोगी पाई गईं। 33 प्रतिशत नौकरी पेशा महिलाओं का कहना था कि अगर उन्हें भी अपने साथ काम करने वालों से उचित सहयोग मिलें तो वह बढ़िया काम कर सकती हैं। शारीरिक शोषण और छेड़छाड़ के मामले में 40 प्रतिशत महलओं का कहना था कि उन्हें स्वयं ही आरम्भिक दिनों में ही इसका सख़्त विरोध करना चाहिए। शोषण करने वालों को क़ानून तथा पुलिस कार्यवाही का भय दिखाना चाहिए। उपरोक्त रिसर्च न तो लेखक द्वारा किया गया न कराया गया और न महिलाओं को नौकरियों से दूर रहने का फ़तवा जारी करने वाले मुफ़्ती साहेबान के द्वारा। अब यह फैसला समाज विशेष रूप से महिलाओं को करना है कि अगर इस स्थिति की समीक्षा की जाए तो देवबंद का फ़तवा किस हद तक निंदनीय है। हम महिलाओं के नौकरी करने पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते। उनके हालात क्या हैं, उन्हें इसकी आवश्यकता कितनी है जहां वह काम करती हैं वहां का वातावरण कैसा है। इस सबको मन में रखते हुए यह निर्णय तो उन्हीं को करना है, लेकिन अगर इस बात का ख़याल रखा जाए कि उनके साथ कोई अशलील व्यवहार न हो, उनका शोषण न हो वह नौकरी तो करें मगर इन बातों का ध्यान रखते हुए कि न तो उनकी आबरू पर आंच और न ही वह मानसिक रोगों का शिकार हों, तो उसमें ग़लत क्या है। पर्दे का सवाल भी इस मसले से मिलता जुलता ही है। क्या हम ईसाई ननों पर, उनके वस्त्रों पर कोई टिप्पणी करते हैं, अगर हम भारतीय समाज की पुरानी परम्परा पर नज़र डालें तो क्या हमें वहां शरीर की नुमाइश मिलती है। क्या हमारे समाज की महिलाएं इस प्रकार अर्धनग्न रहती थीं, जिस तरह हम आज कम कपड़ों वाली महिलाओं को प्रगतिशील कह कर उनका प्रोत्साहन करते हैं। क्या हम वाक़ई अपनी बहन, बेटियों और बहुओं को कम से कम वस्त्रों में देख कर बहुत प्रसन्न होते हैं और उनके इस व्यवहार पर गर्वान्वित होते हैं। अगर ऐसा है तो वास्तव में उन्हें ऐसे फ़तवों पर भरपूर टिप्पणी करनी चाहिए और तूफ़ान भी खड़ा करना चाहिए और अगर उन्हें ज़रा भी ऐसा लगता है कि एक दायरे में रह कर अपनी आबरू का ध्यानरखते काम करने का सुझाव एक उचित सुझाव है तो इससे अलग हट कर कि यह एक मुफ़्ती का फ़तवा है या किसी धर्म का क़ानून उस पर आंख बंद करके टिप्पणी की बजाए उस पर विचार करने की आवश्यकता है।....................................